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विष्णु सूक्त

सुख जाता है  इसलिये बल का नाम ‘शूष्’               (४) शूष् धातु से घण् प्रत्यय करने पर ‘शूष्’ शब्द की सिद्धी होती है । शूषम् मन्म का विशेषण है ।                 (५) मन्म- मन्त्र, मनन , स्रोत  ।                 (६) विममे- उदात्त का लोप नही , पाद के प्रारम्भ में है ,  यद्वृतान्तनित्यं  ।                 (७)पदेभि;-    अवग्रह से अलग नही दिखाया ।                 (प्रयतम्-   दीर्घ,   विशाल  , नियत   (सायण)  ।                  (८) वृष्ण-   वर्धनशील  कामा...

अग्नि सूक्त

२)अग्निः पूर्वेभिः (ऋषिभिरीड्यो नूतनैरुत । स देवाँ एह वक्षति । पद पाठ – अग्नि॥ पूर्वेभिः। ऋषिभिः ।ईड्यः । नूतनैः । उत । सः । देवान् । आ । इह । वक्षति । संदर्भ- ऋग्वेद का प्रथम सूक्त अग्नि सूक्त गायत्री छंद में वर्णित है । इसके ऋषि विश्वामित्र मधुच्छन्दा है । अग्नि दैवता है । प्रस्तुत सूक्त में भगवान वेदपुरुष देवताओं का आव्हान करते हुवे अग्नि की स्तुति करते है ।   जो अग्नि प्राचीन तथा अर्वाचीन मन्त्रदृष्टा ऋषियों के द्वारा स्तुत्य है , वह देवताओं को यहाँ यज्ञ में लावे ।        अग्नि- आमंत्रिते च     इस सूत्र से ‘ग्नि’ उतात्त रहेगा ।       वक्षति -   तिड़तिड़   इस सूत्र से यह सर्वानुदात्त है ।    “वह प्रायणे’’   इस धातु से वक्षति रुप बनता है । मतलब लावे   ।       पूर्वेभि – ‘बहुलं छन्दति”    इति भिस   ऐतादेशाभाव    । पूर्वे +भिस        पूर्वेभिः शब्द ऋषि का विशेषण होने से तृतीया बहुवचन में प्...