भवभूति की कला
भवभूति एक महान नाटककार हुए । सर्वसम्मति से उत्तररामचरित भवभूति की सर्वश्रेष्ठ रचना मानी जाती है । ऐसा प्रतीत होता है कि इस अंतिम नाटक में उन्होंने अपनी पहले की असफलताओं से पाठ ग्रहण किया है तथा कला के उद्धेश्य को भलिभाँति समझा है ।किसी भी रचना का महत्व उसके अलंकार सौष्ठव तथा साहित्यिक आडम्बर की अपेक्षा उसमें निहित मानव स्वभाव तथा जीवन की व्याख्या के स्वरुप में ही है । धार्मिक विधानों से जकड़े हुवे तथा पूर्णरुप से पुरुषों के अधिकृत समाज में स्त्री का स्थान स्वभावत; गौण होता है । वास्तव में वह दासी ही थी और अधिक से अधिक उसका गौरव आदर्श गृहिणी के रुप में था , ऐसी गृहिणी जो अपने ‘निर्माणभाग ‘ से संतुष्ट हो , पति का किसी भी अवस्था में विरोध न करें तथा सपत्नियों को भी सखी भाव से देखे – ऐसे वातावरण में प्रेम –पुष्प यथार्थत; कभी विकसित नही हो सकता । स्वयंवर तथा गांधर्व विवाह पद्धति का भी उल्लेख मिलता है परन्तु इनके अनुकुल आचरण नियम के अपवाद के रुप में ही था । बहुविवाहजन्य नैतिकता के प्रभाव के कारण दाम्पत्य प्रेम जीवन में तो दुर्लभ सा ...